05 Dec 2016

मैदा

मैदा अथवा ब्लीच्ड फ्लाउर (सफेद किया गया आटा) दुनियाभर की अधिकतर पाककृतियों का एक आवश्यक भाग बन चुका है। पाव, नान, रोटी डम्पलिंग्ज (आटे का गोल मीठा व्यंजन), फ्रैंकीज़ (सब्जी भरकर रोटी का बनाया गया रोल), मोमोस (सब्जी अथवा चिकन भरकर मोदक समान दिखनेवाला व्यंजन – उत्तर भारत में बनाया जानेवाला डम्पलिंग) तथा वोन्टन्स (यह एक चायनीज डम्पलिंग प्रकार है) ये सभी मैदे (ब्लीच्ड फ्लाउर) से बनाए जानेवाले विभिन्न प्रकार के पदार्थ हैं। पाव तो हमारे रोजमर्रा के आहार का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन चुका है। इसके साथ ही अन्य अधिकांश विभिन्न व्यंजनों में इसका उपयोग व्यापकरूप से किया जाता है।

मैदा, गेहूँ के आटे से बना हुआ पदार्थ है, दुनियाभर के आहार में प्रमुखता से गेहूँ का उपयोग किया जाता है। इसी तरह यह उत्तर भारत के आहार का भी एक प्रमुख अंग बन गया है। गेहूँ पर कुछ विशेष प्रक्रिया के पश्चात्‌ इसका विशोधित प्रकार हमें इस महीन सफेद आटे (मैदा) के रूप में मिलता है।

परन्तु, हम एक परंपरागत सुप्रसिद्ध कहावत जानते हैं कि, ‘हर चमकनेवाली चीज़ सोना नहीं होती’ यही कहावत यहाँ पर भी लागू होती है। क्यों? क्या मैदा वास्तव में हमारे सेवन के लिए आरोग्यदायी पदार्थ है? क्या इसके ऐसे कुछ दुष्परिणाम हैं जिनके बारे हमें अब तक पता नहीं है? चतो लिए हम अब देखते हैं।

मैदा कैसे बनाया जाता है?

मैदा गेहूँ के दानों पर विशिष्ठ प्रक्रिया के ज़रिए बनाया गया आटा है।

मैदे के बारे में अच्छी तरह से जानकारी पाने के लिए हमें सर्वप्रथम गेहूँ के दाने के बारे में जानना होगा।

गेहूँ के दाने की अंतर्रचना

* ब्रैन – छिलका (भूसी)
– सबसे ऊपरी आवरण
– सबसे मजबूत एवं मोटा स्तर
– विटामिन एवं खनिज पदार्थों से संपन्न स्त्रोत
– गेहूँ में पाया जाने वाला फाइबर (तंतु) का लगभग सारा अंश ब्रैन में होता है।

* एन्डोस्पर्म – भ्रूणपोष
– गेहूँ के दाने का सबसे बड़ा हिस्सा
– मुख्य तौर पर स्टार्च (अनाज का सत्व – कार्बोहाइड्रेट) से बना हुआ।
– बडे पैमाने पर प्रोटीन्स की मात्रा होती है।
– विटामिन, खनिज पदार्थ एवं फाइबर (तंतु) लगभग होते ही नहीं अथवा यदि पाए भी गए तो अल्प प्रमाण में होते हैं।

* जर्म (जनन कोशिका)
– गेहूँ के दाने का वह भाग जिसमें से नवीन वनस्पति अंकुरित होती है
– विटामिन एवं खनिज का उत्तम स्त्रोत साथ ही समुचित प्रमाण में प्रोटीन्स भी होते हैं।

गेहूँ से दो प्रकार का आटा बनाया जा सकता है।

१) गेहूँ का आटा (होल व्हीट फ्लाउर – गेहूँ के अखंड दाने से बनाया गया आटा) :

गेहूँ का पूरा दाना (ब्रैन, एन्डोस्पर्म एवं अकुंर) दरदरा पीसकर तथा कूटकर तैयार किया जाता है। इसके अन्तर्गत तंतुमय पदार्थ, विटामिन एवं खनिजों (कार्बोहायड्रेट्‌स) के अलावा प्रोटीन्स एवं कार्बोहाइड्रेट्स भी होते हैं और पौष्टिक मूल्यों का जतन भी होता है।

२) ब्लीच्ड फ्लाउर (मैदा) :

* ब्लीच्ड किया गया गेहूँ का आटा, जो देखने में सफेद दिखाई देता है, महीन पिसा होता है तथा उसकी बनावट मुलायम होती है।
* ब्रैन (मज़बूत छिलका) एवं जनन कोष वाला भाग अलग करके, यह केवल गेहूँ के दाने के एन्डोस्पर्म (भ्रूणपोष) भाग से बनाया जाता है।
* एन्डोस्पर्म अधिकतर धान्य के सत्व से बना होने के कारण उसमें मुख्यरूप से कार्बोहाइड्रेट होते हैं।
* एन्डोस्पर्म को ब्रैन एवं जनन कोष से अलग करके पीसा जाता है और छानकर अधिक साफ किया जाता है।
* इसमें गेहूँ में पाए जानेवाले रंगद्रव्य के कारण पहले तो यह हल्के पीले रंग का होता है।
* बाद में बेंज़ॉयल पेरॉक्साइड, क्लोरिन डायऑक्साइड, कैल्शियम पेरॉक्साइड, नायट्रोजन डायऑक्साइड, क्लोरिन ऐज़ोडायकार्बोनामाइड, पोटैशियम ब्रोमेट जैसे ब्लीचिंग पदार्थों में से किसी एक का उपयोग करके ब्लीच (शुद्ध सफेद रंग का बनाने के लिए उपयोग में लाया जानेवाला पाउडर) किया जाता है जिससे इस आटे को सफेद रंग प्राप्त होता है।
* मैदे को मुलायम बनाने के लिए उसमें अलोक्सज़ेन नामक एक रसायन मिलाया जाता है।

शुद्धि की प्रक्रिया के दौरान, गेहूँ का आटा निम्नलिखित आवश्यक पोषक तत्त्व गँवा देता है :

* आधे से ज्यादा हितकारी अन्‌साच्युरेटेड फैटी ऐसिड्‌स (असंतृप्त चरबीयुक्त आम्ल)
* विटामिन ई
* ५०% कैल्शियम
* ७०% फॉस्फरस
* ८०% लोह
* ९८% मैग्नेशियम
* ५०-८०% विटामिन बी-कॉम्प्लेक्स
* प्रमुख तौर पर फायबर (तंतुमय पदार्थ)

अब हम मैदा (ब्लीच्ड फ्लाउर) बनाने के लिए उपयोग में लाए जानेवाले ब्लीचिंग एजंट्‌स से संबंधित घातक प्रभावों के बारे में जानेंगे :-

१) बेंज़ॉइल पेरॉक्साइड :
* यह ओमेगा-६ एवं ओमेगा-३ में पाए जानेवाले फैटी ऐसिड्‍स के चयापचय के अन्तर्गत बाधा उत्पन्न करता है।
* यह आटे में मौजूद विटामिन-ए एवं विटामिन-बी को भी नष्ट करता है।

२) क्लोरिन डायऑक्साइड :
* यह आटे में पाए जानेवाले विटामिन-ई को नष्ट करता है।
* इसके कारण बच्चों की शारीरिक वृद्धि उल्लेखनीय ढंग से मंद होती है।

३) ऐज़ोडाइकार्बोनामाइड :
* अस्थमा एवं ऐलर्जी का खतरा बढ़ जाता है।
* वास्तव में यह एक औद्योगिक रसायन है, जिसका उपयोग जूते का सोल एवं योगा के लिए फोम मैट्‌स (योगा करते समय बिछाई जानेवाली चटाई) बनाने के लिए किया जाता है।
* ऐज़ोडाइकार्बोनामाइड के कारण गेहूँ में पाए जानेवाले ग्ल्युटेन का विभंजन रफ्तार से ग्लियाडिन एवं ग्लूटेनिन में होता है। इन दोनों के कारण, शरीर में ग्ल्युटेन इनटॉलरन्स बढ़ जाता है।
* बेकरी के पदार्थों को गरम करते समय, जब यह रसायन उष्ण होता है, तब उसका विभाजन इन दो रसायनों में होता है जो कारसिनोजेन्स (कैंसर उत्पन्न करनेवाले रसायन) के रूप में साबित किए गए हैं।

४) पोटैशियम ब्रोमेट :
* मूत्रपिंड पर विषैला प्रभाव डालता है।
* यह मूत्रपिंड एवं थायरॉईड में कैंसर उत्पन्न करनेवाला रसायन है।
* अधिकतर यूके, यूएस एवं यूरोपियन युनियन देशों में पहले ही इस पर बंदिश डाली गई है।
* भारत सरकार ने भी, हाल ही में, जुलाई २०१६ में पोटेशियम ब्रोमेट पर मैदे में ब्लीचिंग एजंट के रूप में उपयोग में लाए जाने के प्रति प्रतिबंध लगाया है।

५) कैल्शियम पेरॉक्साइड :
* ‘ऑस्ट्रेलियन फुड ऐडिटिवज मार्गदर्शिका’ एलर्जी अथवा अस्थमा के मरीजों को कैल्शियम पेरॉक्साइड युक्त आटा खाने से आगाह किया जाता है।

६) अलोक्सज़ेन :
* मैदा बनाते समय उपयोग में लाया गया अलोक्सज़ेन जब शरीर में प्रवेश करता है तब वह शरीर में ऑक्सिजन मुक्त प्रजाति निर्माण करता है। ये ऑक्सिजन मुक्त प्रजाति पैनक्रिया (पाचक-ग्रंथि) में मौजूद इन्सुलिन तैयार करनेवाले ‘बीटा’ कोशिकाओं को नष्ट करने लगता है। इसी कारण शरीर में इन्सुलिन कम मात्रा में बनने लगता है। इसके परिणामस्वरूप शरीर में शक्कर की मात्रा अनियंत्रितरूप से बढ़ने लगती है। इससे डायबिटीस (मधुमेह) होने का खतरा बढ़ जाता है।

मैदे से बनाए जानेवाले व्यंजन

1. सफेद पाव
2. नान
3. रोटी
4. भटूरे
5. पूरी
6. पराठा
7. केक
8. पेस्ट्रीज
9. कुकीज, बिस्किट, टोस्ट
10. पफ्स
11. सैन्डविचेस
12. क्रीम रोल्स
13. रैप्स एवं रोल्स
14. पिज़्ज़ा बेस
15. पास्ता
16. नूडल्स
17. समोसा
18. कचोरी

मैदा (ब्लीच्ड फ्लाउर) खाने से स्वास्थ्य पर होनेवाले प्रतिकूल परिणाम :

१) डायबिटीज मेलिटस (मधुमेह) :

* आटे में पाए जानेवाले अलोक्सज़ेन पाचक-ग्रंथि में मौजूद इन्सुलिन का उत्पादन करनेवाली कोशिकाएं (बीटा कोशिका) नष्ट कर देता है जिसके कारण इन्सुलिन कम मात्रा में बनता है तथा शरीर में शक्कर का प्रमाण अनियंत्रितरुप में बढ़ने लगता है, जिसकी वजह से मधुमेह का खतरा बढ़ जाता है।
* मैदे में फाइबर भी नहीं होता, जिसके कारण कार्बोहाइड्रेट्‌स (शक्कर) तीव्रता से सोखे जाते हैं। खून में शक्कर का स्तर जल्द बढने लगता है। इन्सुलिन का स्त्राव बढता है, बढे हुए इन्सुलिन के लिए प्रतिरोध बढता है और इससे डायबिटीज मेलिटस (मधुमेह) होता है।

२) मेटाबॉलिक सिंड्रोम :

* मैदे में पाए जानेवाले अलोक्सज़ेन के कारण इन्सुलिन बनानेवाली कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं जिससे इन्सुलिन के कार्य में बाधा उत्पन्न होती है और इन्सुलिन कम मात्रा में बनता है।
* इन्सुलिन का प्रभावी इस्तेमाल न होने के कारण अतिरिक्त शक्कर चरबी में बदल जाती है।
* यह जमी हुई अतिरिक्त चरबी वजन बढ़ाती है, हृदयरोग (एथरोस्क्लेरोसिस) उत्पन्न करती है, खून में कोलेस्ट्रॉल के स्तर में वृद्धि करती है। कुल मिलाकर यही सबकुछ ‘मेटाबॉलिइक सिंड्रोम’ कहलाता है।

३) ओबेसिटी (मोटापा) :

* मैदे में (ब्लीच्ड फ्लाउर) फाइबर की कमी, शक्कर जल्द सोख लेता है। खून में शक्कर की जल्द वृद्धि के कारण इन्सुलिन का स्त्राव बढ़ता है।
* इस अतिरिक्त इन्सुलिन के उत्पादन के कारण शरीर में अधिक मात्रा में चरबी तैयार होती है और इससे मोटापा होता है।
* ब्लीचिंग प्रक्रिया के दौरान, गेहूँ में मौजूद ग्ल्युटेन का विभाजन, ग्लियाडिन एवं ग्ल्युटेनन में होता है। ग्लियाडिन शरीर के रिवॉर्ड सेंटर्स (खुद को ही पुरस्कृत करनेवाले केन्द्र) को उत्तेजित करता है जिससे खाने की इच्छा बढ़ जाती है – भूख बढ़ जाती है – अधिक मात्रा में आहार के सेवन से वजन बढ़ जाता है।

४) गॉल स्टॉन्स (पित्त की पथरी) का खतरा बढ़ जाता है :

* पित्त की पथरी आम तौर पर कोलेस्ट्रॉल की बनी होती है। आहार में मौजूद तंतु कोलेस्ट्रॉल के स्तर की वृद्धि को रोकता है। मैदायुक्त आहार में तंतु की मात्रा कम होती है इसलिए पित्त की पथरी बनने का खतरा बढ़ जाता है।

५) दाह एवं सूजन में वृद्धि :

* दीर्घकालीन मैदायुक्त आहार के सेवन के कारण शरीर में विविध स्थानों पर (उदा. संधि-स्थल) सूजन एवं वेदना उत्पन्न होने का खतरा बढ़ जाता है। जो मरीज़ इस तरह की दीर्घकालीन बीमारी से त्रस्त होते हैं, मैदायुक्त आहार के सेवन से उनकी तकलीफ ज़्यादा बढ जाती है।

६) खून में मौजूद लिपिड (स्निग्धता) का स्तर बढ़ जाता है।

७) हार्ट अटैक (दिल का दौरा) का खतरा बढ़ जाता है :

* असामान्यरूप से बडी मात्रा में मौजूद खराब कोलेस्टॉल दिल की धमनियों में चरबी का स्तर बढने का कारण होता है। जिससे धमनियां सिकुड जाती हैं। इससे दिल के दौरे की संभावना बढ़ जाती है।

८) ब्लीच्ड फ्लाउर में पाए जानेवाले ग्ल्युटेन के उच्च स्तर के कारण ग्ल्युटेन इनटॉलरन्स एवं एलर्जी का खतरा बढ़ जाता है।

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